अर्जुन
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ | aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati ||
हे कृष्ण! जो व्यक्ति श्रद्धा से युक्त है, पर प्रयत्नशील नहीं रह पाता और जिसका मन योग से डिग गया है, वह योग की सिद्धि पाए बिना किस गति को प्राप्त होता है?
व्याख्या अर्जुन ने अभी सुना कि संयम के बिना योग (मन को आत्मा में स्थिर करने का अभ्यास) कठिन है। अब वह पूछता है कि जो श्रद्धालु साधक प्रयत्न में ढीला पड़ जाए और सिद्धि (संसिद्धि) से पहले ही उसका मन भटक जाए, उसका क्या होता है। इसका उत्तर कृष्ण आगे के श्लोकों में देते हैं।
पिछला श्लोक 6.36 अध्याय 6 · ध्यान का मार्ग अगला श्लोक 6.38
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
यहाँ हर श्लोक मूल संस्कृत में है, रोमन लिप्यन्तरण, सरल भाषा में अनुवाद और एक संक्षिप्त व्याख्या के साथ — हिन्दी, अंग्रेज़ी, अरबी, स्पेनिश, फ़्रेंच और तमिल में। अनुवाद इस साइट के लिए सीधे संस्कृत से किए गए और जाँचे गए हैं; वे किसी प्रकाशित अनुवाद पर आधारित नहीं हैं। पढ़ना निःशुल्क है, बिना खाते और बिना विज्ञापन के, और आपकी प्रगति आपके ब्राउज़र में रहती है। श्लोक 1.1 से 18.78 तक गिने गए हैं, कुल 701, जिनमें अध्याय 13 के आरंभ का प्रश्न भी शामिल है।
भाषाएँ: English · हिन्दी · العربية · Español · Français · தமிழ்