शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखते हुए, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए और किसी भी दिशा में इधर-उधर न देखते हुए…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग (मन को स्थिर करने का अभ्यास) के लिए बैठने की विधि बता रहे हैं। यहाँ वे आसन समझाते हैं: पीठ, सिर और गर्दन एक सीध में और स्थिर हों, तथा दृष्टि टिकी रहे, इधर-उधर न भटके। कुछ परंपराएँ "नासिका का अग्रभाग" को शाब्दिक रूप में लेती हैं, जबकि अन्य इसे अधखुली दृष्टि का उसी ओर होना या भौंहों के बीच ध्यान लगाना मानती हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में भी चलता है।