उसी पहले के अभ्यास के बल से वह विवश-सा होकर भी योग की ओर खिंच जाता है। योग को केवल जानने की इच्छा रखने वाला भी शब्दब्रह्म को पार कर जाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि योग के मार्ग से गिरा हुआ साधक अगले जन्म में क्या पाता है। पिछले जन्म की साधना के संस्कार उसे अपने-आप फिर योग की ओर खींच लेते हैं, और योग को जानने की जिज्ञासा ही उसे आगे बढ़ा देती है। शब्दब्रह्म का अर्थ है वेदों का शब्दरूप ज्ञान; शंकराचार्य आदि इसे वैदिक कर्मकांड और उसके फल मानते हैं, जबकि रामानुज इसे प्रकृति के क्षेत्र के अर्थ में लेते हैं।