अर्जुन
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham | tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram ||
हे कृष्ण, मन बड़ा चंचल है, मथ डालने वाला है, बलवान और हठी है। इसे रोकना मुझे वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन लगता है।
व्याख्या कृष्ण द्वारा बताए गए योग (ध्यान के अनुशासन) के उत्तर में अर्जुन अपनी शंका रखता है कि मन (मनस्) को स्थिर करना बहुत कठिन है। वह मन को चंचल, उथल-पुथल मचाने वाला, बलवान और हठी कहता है और उसे वश में करने की तुलना वायु को पकड़ने से करता है। कृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं।
पिछला श्लोक 6.33 अध्याय 6 · ध्यान का मार्ग अगला श्लोक 6.35
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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