अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ |sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||
जो व्यक्ति कर्म के फल का आश्रय लिए बिना अपना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी भी है और योगी भी; वह नहीं जिसने केवल अग्नि का त्याग कर दिया हो, और न वह जिसने केवल कर्म करना छोड़ दिया हो।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को कर्म करने का सही तरीका समझा रहे हैं। उनके अनुसार सच्चा संन्यास और योग (मन का अनुशासन) यह है कि अपना उचित कर्तव्य (कार्य कर्म) फल पर निर्भर हुए बिना किया जाए। केवल यज्ञाग्नि छोड़ देना या कर्म छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। 'निरग्नि' और 'अक्रिय' को कुछ परंपराएँ विशेष आश्रमों के संन्यासी मानती हैं, तो कुछ केवल बाहरी त्याग का संकेत।