जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो पूरी तरह शांत है, उसके भीतर परमात्मा सर्दी और गर्मी में, सुख और दुख में, तथा मान और अपमान में भी स्थिर रूप से विद्यमान रहता है।
व्याख्या
कृष्ण बताते हैं कि मन को जीतने पर वही मन मित्र बन जाता है। जिसने स्वयं पर विजय पाई है (जितात्मा) और जो शांत (प्रशांत) है, वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों में स्थिर रहता है। 'समाहित' को दो तरह से समझा गया है: ऐसे व्यक्ति में परमात्मा पूर्ण रूप से प्रकट है, या वह स्वयं परमात्मा में पूर्णतः स्थित है। दोनों अर्थ एक ही आंतरिक स्थिरता की ओर संकेत करते हैं।