उस अवस्था को, जिसमें दुःख का संयोग छूट जाता है, 'योग' जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय के साथ, बिना उकताए मन से करना चाहिए।
व्याख्या
कृष्ण ध्यान से प्राप्त उस अवस्था का वर्णन समाप्त कर रहे हैं जिसमें बड़ा दुःख भी व्यक्ति को डिगा नहीं पाता। यहाँ वे योग (साधना या मिलन) की परिभाषा दुःख के संयोग से वियोग (दुःखसंयोगवियोग) के रूप में देते हैं। फिर वे बिना निराश हुए (अनिर्विण्णचेतस्) दृढ़ अभ्यास करने की प्रेरणा देते हैं। टीकाकार इस मुक्ति को कहीं आत्मा का देह-मन से तादात्म्य छूटना मानते हैं, तो कहीं ध्यान की गहन समाधि-अवस्था।