हे महाबाहु, दोनों मार्गों से भ्रष्ट हुआ वह मनुष्य, जिसका कहीं कोई आधार नहीं रहा और जो ब्रह्म के मार्ग पर भ्रमित हो गया, क्या बिखरे हुए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता?
व्याख्या
अर्जुन उस व्यक्ति के बारे में पूछ रहा है जो श्रद्धा से योग (आध्यात्मिक साधना) शुरू करता है, पर सिद्धि से पहले ही डिग जाता है। उसे डर है कि ऐसा साधक सांसारिक फल और आध्यात्मिक उन्नति दोनों खो देता है, और फटे बादल की तरह बिखरकर मिट जाता है। यहाँ ब्रह्म का अर्थ परम सत्य है; 'दोनों मार्ग' को टीकाकार अलग-अलग समझते हैं, कुछ कर्म और संन्यास, तो कुछ सांसारिक जीवन और मोक्ष।