सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ |sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate ||
जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में बसे हुए मुझको भजता है, वह योगी चाहे किसी भी प्रकार से जीवन बिता रहा हो, वह मुझमें ही रहता है।
व्याख्या
कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो उन्हें सर्वत्र देखता है। यहाँ योगी (परमात्मा से जुड़ने का अभ्यासी) सब प्राणियों में स्थित कृष्ण को एकत्व की दृष्टि से भजता है। ऐसा व्यक्ति बाहर से किसी भी आचरण या परिस्थिति में हो, वह कृष्ण में ही स्थित रहता है। परंपराएँ इस एकत्व को अद्वैत (अभिन्नता) या भिन्न ईश्वर से भक्तिपूर्ण मिलन, दोनों रूपों में पढ़ती हैं।