जिसका मन योग में स्थिर हो गया है, वह आत्मा को सब प्राणियों में स्थित देखता है और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है; वह हर जगह समान दृष्टि से देखने वाला होता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ उस व्यक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो योग (ध्यान-साधना द्वारा एकत्व) में स्थित हो गया है; पिछले श्लोक में ब्रह्म के संस्पर्श का सुख बताया गया था। ऐसा व्यक्ति आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है, इसलिए सबके प्रति समदृष्टि (समदर्शन) रखता है। अद्वैत परंपरा इसे आत्मा की सर्वव्यापी एकता मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे हर प्राणी को ईश्वर से जुड़ा हुआ देखना समझती हैं।