asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calaṃ |abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||
हे महाबाहो, इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। फिर भी हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि मन वायु की तरह चंचल है और उसे रोकना बहुत कठिन है। उसी के उत्तर में कृष्ण पहले अर्जुन की बात मान लेते हैं, फिर उपाय बताते हैं। अभ्यास का अर्थ है बार-बार और निरंतर प्रयास करना, और वैराग्य का अर्थ है विषयों के प्रति आसक्ति छोड़ना। टीकाकार अभ्यास के विषय को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं: कुछ इसे आत्मचिंतन मानते हैं, तो कुछ ईश्वर का स्मरण।