हे पार्थ, ऐसे व्यक्ति का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। क्योंकि हे तात, कल्याण का कार्य करने वाला कोई भी कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी पूछा था कि जो व्यक्ति श्रद्धा से योग (अनुशासित साधना) का मार्ग शुरू करता है पर लक्ष्य तक पहुँचने से पहले भटक जाता है, उसका क्या होता है। कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि ऐसा साधक न इस जीवन में नष्ट होता है, न उसके बाद। जो कल्याणकारी कर्म (कल्याणकृत्) करता है, वह कभी बुरी गति (दुर्गति) को नहीं पाता।