नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
nātyaśnatastu yogo'sti na caikāntamanaśnataḥ |na cātisvapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna ||
हे अर्जुन! योग न तो बहुत अधिक खाने वाले के लिए है, न बिल्कुल न खाने वाले के लिए; न बहुत सोने के स्वभाव वाले के लिए है, और न ही अत्यधिक जागने वाले के लिए।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग (मन को स्थिर करने के अभ्यास) का तरीका समझा रहे हैं। यहाँ वे खाने और सोने में अति और अभाव, दोनों के विरुद्ध चेताते हैं, क्योंकि इनसे शरीर और मन अशांत होते हैं। अगला श्लोक संयम की बात कहकर इसी विचार को पूरा करता है।