यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati |tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता, और वह भी मुझसे कभी ओझल नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए उस योगी का वर्णन आगे बढ़ाते हैं, जो सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है। यहाँ वे स्वयं कहते हैं कि जो उन्हें सबमें और सबको उनमें देखता है, उसके लिए वियोग नहीं रहता (प्रणश्यति का अर्थ है ओझल होना या नष्ट होना)। भक्ति परंपराएँ इसे भगवान और भक्त के व्यक्तिगत संबंध के रूप में पढ़ती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे आत्मा और परमात्मा की एकता के बोध के रूप में समझती है।