सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu |sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||
जो हितैषियों, मित्रों, शत्रुओं, उदासीनों, मध्यस्थों, अप्रिय लोगों और संबंधियों के प्रति, तथा सज्जनों और पापियों के प्रति भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने उस योगी (योग में स्थित साधक) का वर्णन किया जो तृप्त और अचल है और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को एक-सा देखता है। यहाँ वे यही समता वस्तुओं से बढ़ाकर लोगों तक ले जाते हैं। समबुद्धि का अर्थ है कि पसंद या नापसंद दूसरों के बारे में उसके विवेक को न बिगाड़े। टीकाकारों में मतभेद है: कोई इसे पहले वर्णित योगी से भी श्रेष्ठ मानता है, कोई उसी योगी की पूर्ण अवस्था।