हे अर्जुन! जो सबको अपने ही समान मानकर सब जगह समान दृष्टि से देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वही योगी सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
व्याख्या
कृष्ण योगी का वर्णन आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी दूसरों को अपने समान (आत्मौपम्य) मानकर देखता है। जैसे उसे सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है, वैसे ही सब प्राणियों को है, इसलिए वह उनके सुख-दुःख को अपना ही समझता है। टीकाकारों में इस पर मतभेद है: कुछ इसे सब में एक ही आत्मा का दर्शन मानते हैं, तो कुछ इसे सबके प्रति करुणा और सहानुभूति का आचरण मानते हैं।