सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
sukhamātyantikaṃ yattadbuddhigrāhyamatīndriyam |vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ ||
जहाँ वह उस असीम सुख को जान लेता है, जिसे केवल बुद्धि ग्रहण कर सकती है और जो इंद्रियों की पहुँच से परे है, और जहाँ स्थित होकर वह फिर तत्त्व से विचलित नहीं होता…
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक से आगे उस योगी की अवस्था बता रहे हैं जिसका चित्त योग के अभ्यास से शांत हो गया है। यह सुख असीम (आत्यन्तिक) है; इसे शुद्ध बुद्धि जानती है, इंद्रियों से इसका अनुभव नहीं होता। 'तत्त्वतः' पर टीकाकार भिन्न हैं: कुछ इसे 'अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) से नहीं डिगता' पढ़ते हैं, तो कुछ 'सचमुच विचलित नहीं होता'। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।