जिसकी आत्मा ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो निर्विकार भाव से अडिग रहता है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, ऐसा योगी 'युक्त' कहलाता है। उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना एक समान हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ बताते हैं कि योग में सचमुच स्थित व्यक्ति कैसा होता है। वह ज्ञान और उसके अनुभव (विज्ञान) से तृप्त रहता है, कूटस्थ यानी निहाई की तरह अविचल रहता है और इन्द्रियों को वश में रखता है, इसलिए सोना और मिट्टी उसके लिए समान हैं। ज्ञान और विज्ञान को कुछ परंपराएँ शास्त्र-ज्ञान और अपना अनुभव मानती हैं, कुछ आत्म-ज्ञान और जगत में उसकी अभिव्यक्ति का ज्ञान।