शांत और निर्भय मन से, ब्रह्मचारी के व्रत में दृढ़ रहकर, मन को वश में करके और चित्त को मुझमें लगाकर, वह मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानते हुए योग में स्थिर होकर बैठे।
व्याख्या
कृष्ण ध्यान में बैठने की विधि बताते हुए अर्जुन को अब भीतरी अवस्था समझाते हैं: शांत और निर्भय मन, संयमित आचरण (ब्रह्मचर्य, जिसे कई लोग यौन-संयम और कई व्यापक आत्मसंयम मानते हैं) और ध्यान का लक्ष्य कृष्ण। 'मुझे' का अर्थ कुछ परंपराएँ व्यक्तिगत भगवान कृष्ण लेती हैं और कुछ भीतर स्थित परमात्मा; श्लोक में दोनों अर्थ संभव हैं।