इस प्रकार सदा अपने आपको योग में लगाए रखने वाला योगी, दोषों से मुक्त होकर, सहज ही ब्रह्म के स्पर्श का वह अनंत सुख पाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ योग (मन को आत्मा में एकाग्र करने का अभ्यास) करने वाले साधक का वर्णन जारी रखते हैं। निरंतर अभ्यास से दोष (कल्मष) मिट जाते हैं और योगी सहजता से ब्रह्म (परम सत्य) का स्पर्श पाता है। ब्रह्म के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: अद्वैत इसे आत्मा और परम तत्त्व की एकता मानता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे भगवान की निकटता के रूप में पढ़ती हैं।