जो व्यक्ति आहार और विहार में संयमित है, कर्मों में जिसकी चेष्टा संतुलित है, और जिसका सोना-जागना नियमित है, उसके लिए योग दुःख को मिटाने वाला हो जाता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि बहुत अधिक या बहुत कम खाने-सोने वाले के लिए योग संभव नहीं है। यहाँ वे सकारात्मक बात कहते हैं: भोजन, विश्राम, कर्म, नींद और जागरण में संतुलित जीवन। ऐसे व्यक्ति के लिए योग (मन को आत्मा में स्थिर करने का अभ्यास) दुःख का नाश करने वाला बनता है। 'युक्त' का अर्थ है उचित और नपा-तुला, कठोर तपस्या नहीं।