उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और चित्त तथा इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, वह आत्मा की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
व्याख्या
पिछले श्लोक में आसन का वर्णन करने के बाद कृष्ण अर्जुन को ध्यान के अभ्यास की विधि बता रहे हैं। उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र, यानी एक ही बिंदु पर टिका हुआ, करना चाहिए और चित्त तथा इंद्रियों की चंचल हलचल को वश में रखना चाहिए। योग, यानी अनुशासित ध्यान, का उद्देश्य आत्म-शुद्धि है। इस शुद्धि को कुछ टीकाकार मन और अंतःकरण की सफ़ाई मानते हैं, तो कुछ आत्मा का अशुद्धि से मुक्त होना।