एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
etanme saṃśayaṃ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ |tvadanyaḥ saṃśayasyāsya chettā na hyupapadyate ||
हे कृष्ण, मेरे इस संशय को आप पूरी तरह मिटा दीजिए, क्योंकि आपके सिवा इस संशय को मिटाने वाला दूसरा कोई मिल ही नहीं सकता।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी पूछा है कि जो योग (अनुशासित साधना) शुरू करके उसे पूरा नहीं कर पाता, क्या वह बिखरे बादल की तरह दोनों ओर से भटककर नष्ट हो जाता है? यहाँ वह कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे इस संशय को पूरी तरह मिटा दें, क्योंकि उनके सिवा कोई और ऐसा नहीं कर सकता। कृष्ण का उत्तर अगले श्लोक से शुरू होता है।