अपने ही प्रयत्न से व्यक्ति स्वयं को ऊपर उठाए और स्वयं को गिरने न दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में योग में आरूढ़ होने की बात कही गई थी। यहाँ कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऊपर उठने या गिरने की ज़िम्मेदारी अपनी ही है, और कोई दूसरा यह काम उसके लिए नहीं कर सकता। यहाँ "आत्मा" शब्द का अर्थ कई परंपराओं में मन या व्यक्ति का अपना स्वरूप लिया जाता है। कुछ व्याख्याकार इसे व्यक्तिगत जीव और उसके भीतर के उच्चतर स्व के संबंध के रूप में भी पढ़ते हैं।