योग के अभ्यास से रोका हुआ चित्त जब पूरी तरह शांत हो जाता है, और जब मनुष्य स्वयं से ही अपनी आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट रहता है…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को योग (ध्यान द्वारा मन को आत्मा में जोड़ना) की पूर्ण अवस्था बता रहे हैं; इससे पहले उन्होंने स्थिर मन की उपमा वायुरहित स्थान के दीपक से दी थी। अभ्यास से संयमित चित्त जब शांत हो जाता है, तब साधक आत्मा में ही तृप्ति पाता है और उसे बाहर कुछ नहीं चाहिए। अद्वैत परंपरा 'आत्मा द्वारा आत्मा को देखना' का अर्थ शुद्ध चेतना का अपने स्वरूप को जानना लेती है, जबकि भक्ति परंपराएँ प्रायः इसे जीवात्मा का अपने भीतर परमात्मा को देखना मानती हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।