tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam |yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ||
वहाँ उसे पिछले जन्म में पाई हुई बुद्धि का वह जुड़ाव फिर से मिल जाता है, और हे कुरुनन्दन, वहाँ से वह पूर्ण सिद्धि के लिए फिर प्रयत्न करता है।
व्याख्या
अर्जुन की चिंता यह थी कि जिसका योग मृत्यु के समय अधूरा रह जाए, उसका क्या होता है। कृष्ण कहते हैं कि वह योगियों के कुल में जन्म लेकर पिछले जीवन में पाई हुई आध्यात्मिक समझ (बुद्धिसंयोग) फिर पा लेता है। उसी आधार पर वह पूर्ण सिद्धि (संसिद्धि), यानी मुक्ति, के लिए फिर प्रयास करता है।