अर्जुन
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ॥
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana | etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām ||
हे मधुसूदन! समता के भाव से जिस योग का आपने उपदेश दिया है, मन की चंचलता के कारण मुझे उसकी कोई स्थिर अवस्था दिखाई नहीं देती।
व्याख्या पिछले श्लोक में कृष्ण ने सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखने वाले को श्रेष्ठ योगी कहा था। अर्जुन यहाँ शंका करता है कि मन (मनस्) हमेशा चलायमान रहता है, इसलिए समत्व वाला यह योग (मन को आत्मा से जोड़ने की साधना) स्थिर कैसे रह सकता है। यही आपत्ति अगले श्लोक में मन की चंचलता के वर्णन तक जाती है।
पिछला श्लोक 6.32 अध्याय 6 · ध्यान का मार्ग अगला श्लोक 6.34
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
यहाँ हर श्लोक मूल संस्कृत में है, रोमन लिप्यन्तरण, सरल भाषा में अनुवाद और एक संक्षिप्त व्याख्या के साथ — हिन्दी, अंग्रेज़ी, अरबी, स्पेनिश, फ़्रेंच और तमिल में। अनुवाद इस साइट के लिए सीधे संस्कृत से किए गए और जाँचे गए हैं; वे किसी प्रकाशित अनुवाद पर आधारित नहीं हैं। पढ़ना निःशुल्क है, बिना खाते और बिना विज्ञापन के, और आपकी प्रगति आपके ब्राउज़र में रहती है। श्लोक 1.1 से 18.78 तक गिने गए हैं, कुल 701, जिनमें अध्याय 13 के आरंभ का प्रश्न भी शामिल है।
भाषाएँ: English · हिन्दी · العربية · Español · Français · தமிழ்