मैं ही परम गति हूँ, सबका पालनकर्ता, स्वामी और साक्षी हूँ; मैं ही निवास, शरण और सच्चा मित्र हूँ। मैं ही उत्पत्ति और प्रलय हूँ, आधार हूँ, भंडार हूँ, और कभी नष्ट न होने वाला बीज हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सारे संसार के लिए क्या-क्या हैं: लक्ष्य (गति), साक्षी और शरण जैसे अनेक रूपों में। वे सृष्टि के उद्गम भी हैं और उसके लय का स्थान भी, और 'अव्यय बीज' (बीजमव्ययम्) हैं, यानी ऐसा बीज जिससे सब उगता है पर जो स्वयं कभी चुकता नहीं। परंपराएँ इसे अलग-अलग ढंग से समझती हैं: कुछ इसे सृष्टि से भिन्न व्यक्तिगत ईश्वर का वर्णन मानती हैं, तो कुछ एक ही परम सत्ता का संसार के रूप में प्रकट होना। फिर भी सभी इसे कृष्ण को अस्तित्व का परम आधार बताने वाला मानती हैं।