परन्तु हे पार्थ, महात्मा लोग दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर मुझे सब प्राणियों का आदि कारण और अविनाशी जानते हैं, और एकाग्र मन से मेरी भक्ति करते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने मोह में पड़े उन लोगों की बात की थी जो राक्षसी और आसुरी प्रकृति का सहारा लेते हैं; यहाँ वे उनके विपरीत महात्माओं को रखते हैं। ये लोग दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर कृष्ण को सब प्राणियों का मूल और अविनाशी जानते हैं, और इसी ज्ञान के कारण अनन्य मन से उन्हें भजते हैं। 'दैवी प्रकृति' से सोलहवें अध्याय में गिनाए गए निर्भयता और शुद्धता जैसे गुण समझे जाएँ या ईश्वर की अपनी परा शक्ति, इस पर टीकाकारों में मतभेद है, पर सभी इसे ज्ञानपूर्वक की गई भक्ति का संकेत मानते हैं।