अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर मैं इस समस्त प्राणि-समूह को, जो प्रकृति के वश में होने से विवश है, बार-बार रचता हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को सृष्टि की प्रक्रिया समझा रहे हैं: हर कल्प के आरंभ में वे अपनी प्रकृति, यानी पदार्थ और मन की रचनात्मक शक्ति, का आश्रय लेकर सब प्राणियों को फिर प्रकट करते हैं। प्राणी 'अवश' इसलिए हैं कि वे अपने पिछले कर्मों के अनुसार प्रकृति के अधीन होकर जन्म लेते हैं, अपनी इच्छा से नहीं। परंपराएँ प्रकृति को अलग ढंग से समझती हैं: अद्वैत इसे ब्रह्म की माया-शक्ति मानता है, जबकि विशिष्टाद्वैत और द्वैत इसे ईश्वर पर आश्रित पर वास्तविक सृष्टि-सामग्री मानते हैं।