avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanumāśritam |paraṃ bhāvamajānanto mama bhūtamaheśvaram ||
मैं जब मनुष्य का शरीर धारण करके रहता हूँ, तब मूढ़ लोग मेरा अनादर करते हैं; क्योंकि वे समस्त प्राणियों के महान ईश्वर के रूप में मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनकी अध्यक्षता में प्रकृति सारे चर-अचर जगत को जन्म देती है। यहाँ वे बताते हैं कि मूढ़ (विवेकहीन) लोग केवल उनका मानव शरीर देखते हैं और समस्त प्राणियों के महेश्वर के रूप में उनके परम भाव को नहीं पहचानते। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ इसे ईश्वर के वास्तविक अवतार का कथन मानती हैं, तो कुछ मानव शरीर को सर्वव्यापी आत्मा पर पड़ा आवरण मानती हैं।