हे कुन्तीपुत्र! जो भक्त श्रद्धा से युक्त होकर दूसरे देवताओं की उपासना करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही उपासना करते हैं, परन्तु विधि के अनुसार नहीं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने अनन्य भाव से अपनी उपासना करने वालों की बात कही। यहाँ वे कहते हैं कि श्रद्धा से अन्य देवताओं को पूजने वाले भी वास्तव में उन्हीं की उपासना करते हैं, पर अविधिपूर्वक, यानी उन्हें सबका मूल न जानते हुए। इसकी व्याख्या परंपराओं में भिन्न है: कुछ इसे सच्ची उपासना की व्यापक स्वीकृति मानते हैं, कुछ इसे संकेत मानते हैं कि अन्य देवों की उपासना सर्वोच्च मार्ग से कम है।