तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca |amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna ||
मैं ही ताप देता हूँ; मैं ही वर्षा को रोकता हूँ और उसे बरसाता भी हूँ। हे अर्जुन, अमरता भी मैं हूँ और मृत्यु भी, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
व्याख्या
कृष्ण आगे बताते हैं कि वे सबमें कैसे उपस्थित हैं: सूर्य की गर्मी, वर्षा का रोकना और बरसाना, अमरता (अमृत) और मृत्यु भी। सत् और असत् का अर्थ है 'जो है' और 'जो नहीं है', जिसे प्रकट-अप्रकट या शाश्वत-नश्वर के रूप में भी समझा जाता है। अद्वैत परंपरा इसे दोनों के पीछे एक ही सत्य मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ कृष्ण के सब पर प्रभुत्व पर बल देती हैं।