मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
mayā tatamidaṃ sarvaṃ jagadavyaktamūrtinā |matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥ ||
यह सारा जगत् मुझ अव्यक्त स्वरूप वाले से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को अपने दिव्य स्वरूप का "राजगुह्य" ज्ञान समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि इन्द्रियों से न दिखने वाले अव्यक्त रूप में वे पूरे जगत् में व्याप्त हैं, और सब प्राणी उन्हीं के आधार पर टिके हैं, फिर भी वे उनसे बँधे या बदले नहीं हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझाती हैं: अद्वैत मानता है कि जगत् ब्रह्म पर आश्रित है और ब्रह्म अस्पृष्ट रहता है, जबकि आस्तिक परंपराएँ ईश्वर की सर्वव्यापकता के साथ उसकी परात्परता पर बल देती हैं।