इस जगत का पिता मैं हूँ, माता, धारण करने वाला और पितामह भी मैं हूँ। जानने योग्य तत्त्व, पवित्र करने वाला, ओंकार, तथा ऋग्, साम और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
व्याख्या
अपना वर्णन आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सृष्टि की हर भूमिका के मूल में वही हैं: जगत के माता-पिता, पालनकर्ता और पितामह। वे ही जानने योग्य वस्तु, पवित्र करने वाले, ओंकार और तीनों वेद भी हैं। अद्वैत परंपरा इसे एक ही ब्रह्म की सर्वव्यापकता के रूप में पढ़ती है, जबकि भक्ति परंपराएँ ईश्वर के प्रेमपूर्ण, व्यक्तिगत संबंध पर ज़ोर देती हैं।