अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
api cetsudurācāro bhajate māmananyabhāk |sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ ||
यदि अत्यंत बुरे आचरण वाला व्यक्ति भी अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सही निश्चय कर लिया है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि वे सब प्राणियों के प्रति सम हैं, फिर भी भक्ति करने वाले उनके निकट हैं। यहाँ वे कहते हैं कि बहुत बुरे आचरण वाला भी यदि एकनिष्ठ होकर उन्हें भजे, तो उसे अच्छा ही समझना चाहिए, क्योंकि उसका निश्चय अब सही दिशा में है। टीकाकारों में मतभेद है कि वह वास्तव में अभी साधु है या निश्चित रूप से साधु बनने वाला है; अगला श्लोक इसी बदलाव की बात करता है।