क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati |kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||
वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शांति पाता है। हे कुन्तीपुत्र, तुम निश्चयपूर्वक घोषणा कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण कहते हैं कि अत्यंत बुरे आचरण वाला व्यक्ति भी यदि अनन्य भक्ति से उनकी ओर मुड़े, तो वह शीघ्र ही धर्म (सही आचरण और जीवन को धारण करने वाली व्यवस्था) में स्थित हो जाता है और स्थायी शांति पाता है। फिर वे अर्जुन से दृढ़ता से यह घोषित करने को कहते हैं कि उनका भक्त कभी नष्ट नहीं होता। "शीघ्र" और "नष्ट नहीं होता" के अर्थ पर परंपराओं में भेद है: कुछ ईश्वर की कृपा पर बल देती हैं, कुछ भक्त के निरंतर प्रयास पर; पर सभी इसे आशा का आश्वासन मानती हैं।