अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca |na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te ||
सभी यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। परन्तु वे मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप में नहीं पहचानते, इसी कारण वे नीचे गिर जाते हैं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि अन्य देवताओं के भक्त भी वस्तुतः उन्हीं की पूजा करते हैं, पर विधिपूर्वक नहीं। अब वे बताते हैं कि हर यज्ञ का भोक्ता और स्वामी वे ही हैं; जो इस तत्त्व को नहीं जानते, वे च्युत हो जाते हैं। व्याख्याकार इस 'च्युत होने' को कहीं पुनर्जन्म में लौटना और कहीं परम लक्ष्य से चूकना समझते हैं।