मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही स्वधा हूँ और मैं ही औषधि हूँ। मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही आहुति हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि वे सबमें व्याप्त हैं। यहाँ वे वैदिक अनुष्ठान के हर अंग का नाम लेते हैं: क्रतु (अनुष्ठान), यज्ञ, स्वधा (पितरों को अर्पण), औषध (जड़ी-बूटी या अन्न), मंत्र, आज्य (घी), अग्नि और हुत (आहुति)। भाव यह है कि अनुष्ठान, उसकी सामग्री और उसका फल, सब कृष्ण ही हैं। कुछ शब्दों पर टीकाकारों में मतभेद है, जैसे क्रतु और यज्ञ में क्या अंतर है, और स्वधा का अर्थ पितरों को अर्पण है या पितरों को दिया गया अन्न।