अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी उपासना करो और मुझे प्रणाम करो। इस प्रकार स्वयं को मुझसे जोड़कर, मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए तुम मुझ तक ही पहुँचोगे।
व्याख्या
अध्याय नौ के अंत में कृष्ण अर्जुन को अपनी शिक्षा का सार देते हैं: मन उन्हीं में लगाना, उनके प्रति भक्ति रखना, पूजा और नमस्कार करना। यहाँ आत्मा को “युक्त” करने का अर्थ है स्वयं को भीतर से ईश्वर से जोड़ना और अनुशासित करना, और फल है कृष्ण को ही प्राप्त करना। परंपराओं में व्याख्या भिन्न है: भक्ति-परंपराएँ इसे प्रेममयी भक्ति का सार मानती हैं, जबकि अद्वैत-दृष्टि “मैं” को सबमें एक आत्मतत्त्व के रूप में समझती है।