अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate |teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham ||
जो लोग अनन्य भाव से केवल मेरा ही चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा मुझमें लगे हुए भक्तों के योग और क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि कर्मकांड से स्वर्ग चाहने वाले पुण्य घटने पर फिर मर्त्यलोक में लौटते हैं। यहाँ वे उनसे उन भक्तों की तुलना करते हैं जो केवल उन्हीं का स्मरण करते हैं और निरंतर उनमें लगे रहते हैं। वे वचन देते हैं कि जो अभी प्राप्त नहीं है उसे दिलाएँगे (योग) और जो प्राप्त है उसकी रक्षा करेंगे (क्षेम)। टीकाकारों में मतभेद है कि इसका अर्थ भौतिक कल्याण है, आध्यात्मिक प्राप्ति है, या दोनों।