हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी अपनी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। फिर अगले कल्प के आरंभ में मैं उन्हें दोबारा रचता हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सब प्राणी उनमें स्थित हैं, और अब सृष्टि और प्रलय के चक्र का वर्णन करते हैं। कल्प ब्रह्मांड का एक विशाल युग है। उसके अंत में प्राणी उनकी प्रकृति, यानी सृष्टि की मूल सामग्री या रचनात्मक शक्ति, में लीन हो जाते हैं, और अगले कल्प के आरंभ में वे उन्हें फिर प्रकट करते हैं। प्रकृति और कृष्ण के संबंध पर परंपराओं में मतभेद है: अद्वैत इसे उनकी माया-शक्ति मानता है, जबकि द्वैत और भक्ति परंपराएँ इसे उनसे भिन्न पर पूर्णतः उन पर आश्रित मानती हैं।