aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||
हाय! कितने आश्चर्य और दुख की बात है कि हम एक भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, क्योंकि राज्य के सुख के लोभ में हम अपने ही स्वजनों को मारने को तैयार हो गए हैं।
व्याख्या
युद्धभूमि में शोक से घिरा अर्जुन पिछले श्लोक में कुलधर्म के नष्ट होने के दुष्परिणाम बता चुका है। यहाँ वह दोष स्वयं पर और अपने पक्ष पर लेता है और कहता है कि राज्य-सुख के लोभ में हम बड़े पाप की ओर बढ़ रहे हैं। इन शब्दों में शस्त्र छोड़ने से पहले की उसकी नैतिक पीड़ा झलकती है।