सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati |vepathuśca śarīre me romaharṣaśca jāyate ||
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुँह सूख रहा है। मेरे शरीर में कंपकंपी हो रही है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
व्याख्या
अर्जुन अपने ही स्वजनों को युद्ध के लिए सामने खड़ा देखकर बताता है कि करुणा (कृपा) और शोक उसके शरीर पर कैसा असर डाल रहे हैं। इस श्लोक में पहले लक्षण गिनाए गए हैं: अंगों का ढीला पड़ना, मुँह सूखना, कंपकंपी और रोमांच। युद्ध के बारे में अपनी शंकाएँ कहने से पहले ही उसका संकल्प डगमगाता दिखता है।