निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava |na ca śreyo'nupaśyāmi hatvā svajanamāhave ||
हे केशव, मुझे तो लक्षण भी उलटे ही दिखाई दे रहे हैं। और युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण होता नहीं दिखता।
व्याख्या
अर्जुन युद्धभूमि में अपने संबंधियों को देखकर व्याकुल है और कृष्ण (केशव) से कहता है कि उसे अशुभ लक्षण (निमित्त) दिख रहे हैं। साथ ही अपने ही लोगों को मारने में उसे कोई स्थायी कल्याण (श्रेयस्) नहीं दिखता। यहाँ से वह केवल अपनी घबराहट नहीं, बल्कि युद्ध के उद्देश्य पर ही प्रश्न उठाने लगता है।