वहाँ पार्थ ने अपने सामने खड़े पिताओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को भी देखा…
व्याख्या
संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि कृष्ण के "इन कुरुओं को देखो" कहने पर अर्जुन (पार्थ, यानी पृथा-कुंती के पुत्र) ने युद्धभूमि में क्या देखा। उसे सामने अपने ही बड़े-बुज़ुर्ग, गुरु और परिजन दिखाई देते हैं, और यहीं से उसके मन की उलझन शुरू होती है। यहाँ "पितॄन्" का अर्थ पिता की पीढ़ी के बड़े लोग, जैसे चाचा-ताऊ, भी लिया जा सकता है। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।