अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥
asmākaṃ tu viśiṣṭā ye tānnibodha dvijottama |nāyakā mama sainyasya saṃjñārthaṃ tānbravīmi te ||
हे द्विजश्रेष्ठ, अब हमारे पक्ष के जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें भी जान लीजिए। वे मेरी सेना के नायक हैं। आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम आपको बताता हूँ।
व्याख्या
संजय यहाँ दुर्योधन के शब्द सुना रहे हैं, जो अपने गुरु द्रोणाचार्य से बात कर रहा है। पांडव पक्ष के योद्धाओं को गिनाने के बाद अब वह अपने पक्ष के नायकों का परिचय देने लगता है। "द्विजोत्तम" (द्विज, यानी दो बार जन्मा) द्रोण जैसे विद्वान ब्राह्मण के लिए आदरसूचक संबोधन है। कुछ पाठक अपने वीरों की इस गिनती में दुर्योधन का आत्मविश्वास देखते हैं, तो कुछ इसे भीतर की बेचैनी को ढकने का प्रयास मानते हैं।