यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥
yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam ||
यद्यपि लोभ से विवेक खो बैठे ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह करने के पाप को नहीं देखते…
व्याख्या
अर्जुन कृष्ण को समझा रहे हैं कि वे अपने ही संबंधियों से युद्ध क्यों नहीं कर पा रहे। वे कहते हैं कि कौरव लोभ से इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें कुल के विनाश (कुलक्षय) की हानि और मित्रों से विश्वासघात का पाप दिखाई नहीं देता। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, जहाँ अर्जुन कहते हैं कि जो यह दोष देख रहे हैं, उन्हें इस पाप से पीछे हट जाना चाहिए।