न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||
हे कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द, हमें राज्य से क्या लेना, भोगों से क्या, या फिर जीवन से भी क्या?
व्याख्या
युद्धभूमि में अपने स्वजनों को सामने खड़ा देखकर अर्जुन संदेह से भर जाता है और कहता है कि युद्ध के सामान्य फल अब उसके लिए अर्थहीन हो गए हैं। वह कृष्ण को गोविन्द (गायों के रक्षक, या इन्द्रियों के ज्ञाता) कहकर पूछता है कि अपने ही लोगों को मारकर मिली विजय, राज्य, सुख या जीवन का भी क्या मूल्य रह जाएगा।