येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
yeṣāmarthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca |ta ime'vasthitā yuddhe prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca ||
जिन लोगों के लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, वे ही अपने प्राण और धन का त्याग करके युद्ध में यहाँ खड़े हैं।
व्याख्या
अर्जुन मोह और संशय में डूबा हुआ कृष्ण से कह रहा है कि उसे युद्ध का कोई अर्थ नहीं दिखता। राज्य और सुख अपने प्रियजनों के लिए ही चाहे जाते हैं, पर वही लोग यहाँ मरने को तैयार खड़े हैं। 'प्राण और धन त्यागकर' का आशय है कि उन्होंने युद्ध में सब कुछ दाँव पर लगा दिया है।